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वनवासियों के प्रेम और समरसता से सिंचित रहा प्रभु श्रीराम का वनवास काल

​परभणी। स्थानीय स्टेशन रोड स्थित पेड़ा हनुमान मंदिर परिसर में आयोजित सात दिवसीय ‘श्रीमद्वाल्मीकि रामायण कथा महोत्सव’ के अंतिम दिन कथा व्यास पं. निर्मल कुमार शुक्ल ने प्रभु श्रीराम के वनवास काल, चित्रकूट प्रसंग और भक्त-वत्सलता का अत्यंत मर्मस्पर्शी वर्णन किया।

​कथा व्यास निर्मल कुमार शुक्ल ने कहा कि वनवास काल के दौरान भगवान श्रीराम ने लगभग ११ वर्ष चित्रकूट की पावन धारा पर व्यतीत किए। यह स्थान प्रभु को इतना प्रिय लगा कि उन्होंने माता सीता से कहा कि यदि लक्ष्मण और तुम साथ हो, तो १४ वर्ष ही क्या, संपूर्ण जीवन चित्रकूट में व्यतीत किया जा सकता है। यहाँ के निष्छल वनवासी कोल-किरातों ने प्रभु को अयोध्या से भी अधिक स्नेह दिया और उनकी देखरेख इस प्रकार की कि श्रीराम के चरणों में एक काँटा तक नहीं चुभा।

​पं. शुक्ल ने रेखांकित किया कि सामाजिक समरसता और वास्तविक समाजवाद का अंकुरण राम वनवास से ही हुआ, जहाँ राजा और प्रजा एक ही धरातल पर खड़े हुए तथा छुआछूत एवं भेदभाव समूल नष्ट हो गया। गोस्वामी तुलसीदास जी के कथनानुसार, जो ईश्वर वेदों और मुनियों के ध्यान में भी दुर्लभ हैं, वे भीलों के बालकों को पिता समान दुलार प्रदान करते हैं।

​उन्होंने आगे कहा कि भगवान ने उपेक्षित वर्ग को संगठित कर १०० योजन विस्तीर्ण समुद्र पर बिना सीमेंट, लोहे अथवा अर्थ-प्रलोभन के सेतु का निर्माण करवा दिया—जो आधुनिक युग के लिए भी एक महान शिक्षा है। माता शबरी के भक्ति भाव से अर्पण किए गए फलों का रसास्वादन कर प्रभु ऐसे तृप्त हुए कि उन्हें कौशल्या माता एवं गुरुपत्नी अरुंधती के हाथ का सुस्वादु भोजन भी इसके समक्ष फीका प्रतीत हुआ। वहीं केवट के पावन प्रेम व चरण प्रक्षालन से प्रसन्न होकर प्रभु ने उसे जीवनभर के लिए अपना सखा बना लिया। श्रीराम का यही आचरण उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम सिद्ध करता है।

​उल्लेखनीय है कि विगत २० वर्षों से पेड़ा हनुमान मंदिर में श्रावण मास के अवसर पर पं. शुक्ल जी द्वारा राम कथा का आयोजन होता आ रहा है। वे पिछले ४५ वर्षों से इस नगर में धर्म जागृति कर रहे हैं।

​कथा के गरिमामय समापन अवसर पर पं. श्रीराम तिवारी, पं. योगेश तिवारी, नीलेश तिवारी, महेश सोनी, एड. रमेश शर्मा, ओमप्रकाश उपाध्याय, ओमप्रकाश भूगड़ा, रामकिशन भूतड़ा एवं ठाकुर शिवेंद्र सिंह सहित अनेक गणमान्य श्रद्धालुओं ने पूज्य महाराज श्री का पूजन-अर्चन कर आभार व्यक्त किया।

​॥ लोकोपदेश ॥

​संदेश: प्रभु श्रीराम का जीवन दर्शन हमें यह सिखाता है कि समाज का वास्तविक उत्थान बाह्य संसाधनों से नहीं, अपितु आपसी प्रेम, सद्भाव और छुआछूत-रहित समरसता से संभव है। ईश्वर धन, पद या जाति नहीं, केवल निष्छल प्रेम और भाव के भूखे हैं। जब समाज का सक्षम वर्ग उपेक्षित एवं वंचित वर्ग को गले लगाकर साथ लेकर चलेगा, तभी एक आदर्श और सशक्त ‘रामराज्य’ की स्थापना हो सकेगी।

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