राज्यशिक्षा

सनातन वैदिक संस्कृति में श्रीमन्महागणपति महिमा— उपासना, स्वरूप और आज के युग में धर्म-जागृति की आवश्यकता

आचार्य जयेश शास्त्री पेडगांवकर

श्रीमन्महागणपति का तात्विक स्वरूप एवं विविध नाम महिमा

सनातन वैदिक परंपरा में शतपथ ब्राह्मण, मांडूक्य उपनिषद, मुद्गल उपनिषद तथा श्रीमद्भगवद्गीता भावार्थ दीपिका के अनुसार ‘यथा त्वं उपास्यसे तथैव भवति’ का शाब्दिक विधान है; अर्थात् साधक जैसी उपासना करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि तैजसरूपी परमात्मा एवं विश्वनामक परमात्मा के स्वरूप सदृश हैं, जिनमें कुल उन्नीस मुख—नौ दाएं, नौ बाएं तथा मध्य में गजमुख विद्यमान हैं। इसी परम तत्त्व की उपासना से विघ्नहर्ता को गजमुख की प्राप्ति हुई। पुराणोक्त संदर्भ में दुर्वासा ऋषि द्वारा प्रदत्त अर्कपुष्प माला का ऐरावत द्वारा अनादर किए जाने पर देवराज इंद्र को श्रीहीन होने का शाप मिला था, जिसके उपरांत उसी ऐरावत का मस्तक गजानन के देह पर स्थापित हुआ। गणपति के प्रत्येक नाम में गूढ़ दर्शन निहित है: अपने अद्वितीय आत्मबल से विघ्नों का समूल नाश करने के कारण वे ‘एकदंत’ हैं; पितृ-प्रदत्त विष्णु नैवेद्य से संतुष्ट होने वाले ‘लंबोदर’ हैं; भक्तों की ज्ञानयुक्त एवं श्रमसाध्य उपासना से तृप्त होकर कानों के संचालन मात्र से ऐश्वर्य, ज्ञान और विघ्न-मुक्ति प्रदान करने वाले ‘शूर्पकर्ण’ हैं; दीन-हीन एवं अनाथों के संरक्षक ‘हेरंब’ हैं तथा समस्त संकटों का शमन कर वैभव प्रदान करने के कारण वे साक्षात् ‘विघ्ननायक’ हैं।ऐसा प्रतिपादन आचार्य जयेश शास्त्री पेडगांवकर ने बसमत जि़ हिंगोली मे किया।

धार्मिक संस्कार एवं मंदिरों से जुड़ाव: भावी पीढ़ी का रक्षा-कवच

 आगे बोलते हुए आचार्य ने कसा,वैदिक सनातन धर्म की जीवंतता और निरंतरता बनाए रखने के लिए आज प्रत्येक हिंदू गृह में संस्कारों का पुनर्जागरण अपरिहार्य हो चुका है। परिवार के वरिष्ठ जनों, बालकों, कन्याओं तथा युवाओं को प्रतिदिन निकटवर्ती देवालयों एवं मठों में जाकर सामूहिक उपासना का संकल्प लेना होगा। जीवन में संतुलन और चारित्रिक संवर्धन के लिए प्रातःकाल बल-उपासना और सायंकाल स्तोत्र-पारायण की दिनचर्या अपनाना समय की मांग है। इसके साथ ही नई पीढ़ी को अपने सनातन रीति-रिवाजों, पर्व-परंपराओं और कुल-धर्म से भली-भांति अवगत कराना अनिवार्य है, ताकि सांस्कृतिक पहचान अक्षुण्ण बनी रहे।

व्यसन-मुक्ति और धर्माचरण ही सामाजिक पुनरुत्थान का आधार–

वयसनाधिनता को युवको मे बढते हुए देखील जयेश जी ने कहा–

वर्तमान परिदृश्य में व्यसनाधीनता से ग्रस्त होता समाज आंतरिक दुर्बलता की ओर अग्रसर हो रहा है, जो राष्ट्र और धर्म दोन के लिए गंभीर संकट का विषय है। इस अधोगति से उबरने के लिए युवाओं को व्यसनों से पूर्णतः मुक्त कर उनमें स्वधर्म के प्रति स्वाभिमान और सजगता का संचार करना वर्तमान समय की परम आवश्यकता है। ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ के अमर सिद्धांत को रेखांकित करते हुए  उन्होंने यह स्पष्ट किया कि धर्म उसी की रक्षा करता है जो धर्म की रक्षा और आचरण करता है; अतः आचार-विचार की शुद्धि और सामूहिक जागरण ही सनातन समाज के सशक्त भविष्य का एकमात्र मार्ग है।प्रवचनकार ह. भ. प. जयेश शास्त्री पेडगांवकर का डॉ. शरद महाराज आंबेकर ने कंबल और श्रीफल भेंट कर सम्मान किया।

कार्यक्रम में श्री गणेश मंडल के सभी सदस्यों सहित वसमत की ब्राह्मण गली के समस्त गणेश भक्त और स्थानीय नागरिक भारी संख्या में उपस्थित रहे।

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