स्थानीय स्टेशनरोड स्थित पेड़ा हनुमान मंदिर परिसर में आयोजित सात दिवसीय वाल्मीकि रामायण कथा महोत्सव के पांचवें दिवस कथाव्यास पं. निर्मल कुमार शुक्ल ने भगवान श्रीराम के वन गमन एवं उनके अलौकिक व्यक्तित्व पर मर्मस्पर्शी विचार व्यक्त किए।
कथा का वाचन करते हुए पं. निर्मल कुमार शुक्ल ने कहा कि श्रीराम का वनवास केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि विश्व राजनीति और मानव इतिहास की सबसे अलौकिक एवं अद्वितीय घटना है।
समाचार के मुख्य अंश
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- राज्यप्राप्ति और वनवास पर समान भाव: – मानसमहारथी शुक्ल ने कहा कि संसार के इतिहास में ऐसा उदाहरण नहीं मिलता, जहाँ एक ओर पुत्र को संपूर्ण त्रैलोक्य के सबसे समृद्ध साम्राज्य (अयोध्या) का सम्राट बनने की सूचना मिले और उनके चेहरे पर अहंकार या अत्यधिक हर्ष की एक रेखा तक न दिखे। वहीं दूसरी ओर, जब अगली ही सुबह उन्हें १४ वर्ष के कठोर वनवास का समाचार मिला, तब भी उनके मुखमंडल पर तनिक भी विषाद या दुःख प्रकट नहीं हुआ।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने जिस “सुखे दुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ” (सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समान रहने) की स्थिति का वर्णन किया है, उसका जीवंत एवं प्रत्यक्ष दर्शन भगवान श्रीराम के जीवन में दिखाई देता है।
अयोध्या का त्याग और अनासक्ति: गोस्वामी तुलसीदास जी के भावों को उद्धृत करते हुए महाराज जी ने कहा कि जैसे कोई पथिक धर्मशाला में रात्रि विश्राम करके प्रातःकाल बिना मुड़कर देखे आगे निकल जाता है, ठीक उसी प्रकार श्रीराम ने अवध के अकूत वैभव को त्याग दिया। जैसे जाल से छूटकर हिरण आनंदित होकर वन की ओर दौड़ता है, वैसे ही श्रीराम वनमार्ग पर अग्रसर हो गए। महर्षि वाल्मीकि के अनुसार, श्रीराम जब तक अयोध्या की सीमा में रहे, उन्होंने जल तक ग्रहण नहीं किया।
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- उपेक्षित वर्ग का कल्याण व रामराज्य की नींव: १४ वर्षों के वनवास काल में श्रीराम ने केवट, कोल, भील, किरात एवं वनवासियों को अपने पुत्र के समान वात्सल्य दिया। समाज के सबसे अंतिम और उपेक्षित वर्ग के दुःख-दर्द को समझा तथा आगे चलकर ‘रामराज्य’ की स्थापना कर उन सभी समस्याओं का स्थायी समाधान किया।
- भरत का त्याग और भ्रातृ-प्रेम: उधर ननिहाल से लौटने पर जब श्री भरत जी को श्रीराम के वनवास का समाचार मिला, तो वे अत्यंत व्यथित हुए। उन्होंने कैकेई का त्याग कर दिया और जीवनभर उन्हें ‘माता’ नहीं कहा। अयोध्या के साम्राज्य को तृण के समान ठुकरा कर वे श्रीराम को मनाने चित्रकूट पहुँचे। जब श्रीराम पितृ-आज्ञा के कारण वापस नहीं लौटे, तो भरत जी उनकी चरण-पादुकाओं को सिंहासन पर विराजमान कर १४ वर्षों तक नंदीग्राम में कठोर तपस्वी का जीवन जीते हुए अयोध्या की सेवा करते रहे।
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समाज के लिए संदेश
महाराज जी ने इस पावन कथाप्रसंग से वर्तमान समाज को निम्नलिखित महत्वपूर्ण प्रेरणाएँ मिलती हैं:
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- समभाव एवं मानसिक स्थिरता: जीवन में परिस्थितियाँ चाहे अत्यधिक अनुकूल (राज्याभिषेक) हों या विपरीत (वनवास), मनुष्य को अपना मानसिक संतुलन नहीं खोना चाहिए।
- त्याग और निस्वार्थ भ्रातृ-प्रेम: आज के दौर में जहाँ भौतिक संपत्ति के लिए परिवारों में मतभेद होते हैं, वहीं श्रीराम और भरत का चरित्र सिखाता है कि संबंधों और धर्म के सामने साम्राज्य भी तुच्छ है।
- वंचित वर्ग का सम्मान: समाज के उपेक्षित और अंतिम व्यक्ति को गले लगाकर ही एक समर्थ एवं रामराज्य जैसे आदर्श समाज का निर्माण किया जा सकता है।
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संबंधित पावन चौपाइयां (श्रीरामचरितमानस)
१. श्रीराम के समभाव पर (प्रसन्नता और शोक से परे):
प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः।
मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मञ्जुलमङ्गलप्रदा॥
(भावार्थ: जिनका मुखारविंद न तो राज्याभिषेक की बात सुनकर प्रसन्नता से खिला और न ही वनवास के दुःख से मुरझाया, वे श्री रघुनाथजी का मुखकमल सदा हमारे लिए कल्याणकारी हो।)
२. श्री भरत जी के भ्रातृ-प्रेम एवं त्याग पर- निर्मल कुमार शुक्ल जी ने कहा-
भरत चरित कारि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं।
सीय राम पद नेहु होइ बिराग बिबेकु बलु॥
(भावार्थ: भरत जी के चरित्र और नियमों को जो मनुष्य आदरपूर्वक सुनते हैं, उनका श्री सीताराम जी के चरणों में प्रेम होता है और उन्हें वैराग्य, विवेक तथा बल की प्राप्ति होती है।) मंदिर के व्यवस्थापक पं श्रीराम तिवारी एवं पेड़ा हनुमान भक्त मंडल ने 10 अगस्त तक प्रतिदिन दोपहर 3 से 6 बजे तक रामकथा का सभी श्रद्धालुओं से अधिकाधिक संख्या में पधार कर कथामृत पान करने का आग्रह किया है।
