संयोग, प्रयोग या सुनियोजित षड्यंत्र?
परभणी: चार दिन पूर्व परभणी में घटित हुई विचलित करने वाली घटना को मात्र एक मानवीय त्रुटि माना जाए या प्रशासन की घोर लापरवाही? यह एक अनुत्तरित प्रश्न है जो जनमानस में भय उत्पन्न कर रहा है। कुछ माह पूर्व मध्य प्रदेश में दूषित एवं विषाक्त जल के सेवन से अनेक नागरिकों की मृत्यु हुई थी और सैकड़ों लोग अस्वस्थ हुए थे, किंतु दुर्भाग्यवश उस भीषण त्रासदी से किसी ने कोई बोध नहीं लिया।
प्राणवायु के समान जल और प्रशासनिक उदासीनता
किसी भी नगर के लिए सुचारू जल आपूर्ति उसके ‘प्राण’ के समान होती है। सरकार इस सेवा के बदले नागरिकों से भारी मात्रा में टैक्स
वसूलती है, किंतु विडंबना यह है कि जल वितरण के समय अत्यंत उत्तरदायित्वहीनता
बरती जाती है। ग्रीष्म ऋतु के आगमन के साथ ही कृत्रिम जल संकट उत्पन्न कर ‘टँकर माफिया’ सक्रिय हो जाते हैं, जिससे विवश होकर जनता को असुरक्षित स्रोतों या अप्रमाणित ‘वॉटर फिल्टर’ संयंत्रों से जल खरीदने पर मजबूर होना पड़ता है। क्या शासन की दृष्टि इस गंभीर समस्या पर कभी पड़ेगी?
संदेह के घेरे में जल आपूर्ति विभाग-
सबसे ज्वलंत प्रश्न यह है कि पाइपलाइन के माध्यम से नलों में मांस के टुकड़े और दुर्गंधयुक्त जल कैसे आ सकता है? यदि प्रशासन का यह तर्क है कि पाइपलाइन में रिसाव (Leakage) था, तो नियमित निरीक्षण करना किसका उत्तरदायित्व है? जिस स्थान पर पाइपलाइन क्षतिग्रस्त थी, क्या वहां कोई मृत पशु सड़ रहा था? यदि हाँ, तो वह पशु इतने दिनों तक वहां पड़ा रहा कि सड़कर उसके अवशेष जलवाहिनी में समा गए, क्या तब तक महानगरपालिका के कर्मचारी कुंभकर्णी निद्रा में लीन थे?
घातपात या षड्यंत्र की आशंका?
यदि यह लापरवाही नहीं है, तो क्या यह किसी ‘घातपात’ (Sabotage) का संकेत है? जल में मांस के टुकड़े पहुँचना अत्यंत संदेहास्पद है। प्रश्न यह भी उठता है कि वे अवशेष किस पशु के थे? क्या किसी ने जानबूझकर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने या जनहानि पहुँचाने के उद्देश्य से यह कृत्य किया है?
इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच अनिवार्य है। प्रशासन को अविलंब पुलिस थाने मे प्राथमिकी दर्ज कर वैज्ञानिक पद्धति से इसकी जांच करानी चाहिए, ताकि सत्य जनता के सम्मुख आ सके।

