श्रीमद् वाल्मीकि रामायण समस्त काव्यों का मूल आधार तथा पृथ्वी की प्रथम रचना
मानस महारथी पं.निर्मलकुमारजी शुक्ला
परभणी (महाराष्ट्र):
”वाल्मीकि रामायण विश्व के संपूर्ण काव्यों का सनातन बीज है तथा यह धरा की सर्वप्रथम काव्य रचना है।” यह उद्गार प्रयागराज से पधारे मानस महारथी पंडित निर्मल कुमार शुक्ल ने व्यक्त किए। वे स्थानीय श्री पेड़ा हनुमान मंदिर में श्रावण मास के पावन अवसर पर आयोजित श्रीमद् वाल्मीकि रामायण की भव्य कथा के शुभारंभ अवसर पर श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे।
पं. शुक्ल ने अपनी ओजस्वी वाणी से ग्रंथ की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वाल्मीकि रामायण एक अत्यंत अलौकिक ग्रंथ है, जिसके मुख्य नायक और प्रथम श्रोता स्वयं भगवान श्री राम ही हैं।
कथा का मुख्य प्रसंग:
कथाक्रम का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि जब श्री राम ने देवी सीता का परित्याग किया, तब लक्ष्मण जी उन्हें महर्षि वाल्मीकि के आश्रम के समीप छोड़ आए थे। महर्षि वाल्मीकि, महाराज जनक के परम मित्र थे; अतः उन्होंने सीता जी को पुत्री के समान आश्रय प्रदान किया। आश्रम में निवास के दौरान सीता जी के मुख से संपूर्ण वृत्तांत सुनकर महर्षि ने ‘श्री रामायण’ महाकाव्य की रचना की।
तत्पश्चात् सीता जी के दोनों पुत्रों—लव और कुश को यह ग्रंथ कंठस्थ कराया गया और उन्हें अयोध्या भेजा गया। जब दोनों राजकुमारों ने अयोध्या की गलियों में वीणा की मधुर ध्वनि और गंधर्वों जैसे दिव्य स्वर में रामकथा का गायन प्रारंभ किया, तब संपूर्ण अवधवासी मुग्ध होकर उनके पीछे चलने लगे।
जब यह समाचार संपूर्ण नगर में फैला, तब राजमार्ग से निकल रहे भगवान श्री राम भी उस मधुर स्वर-लहरी में लीन हो गए। उन्होंने लक्ष्मण जी को भेजकर लव-कुश को राजसभा में आमंत्रित किया। राजदरबार में जब बालकों ने कथा गायन आरंभ किया, तो भगवान श्री राम स्वयं सिंहासन छोड़कर श्रोताओं के बीच जाकर बैठ गए। इस प्रकार इतिहास में प्रथम बार कथा के नायक श्री राम ने स्वयं यजमान बनकर अपनी ही कथा का श्रवण किया।
ग्रंथ का वैशिष्ट्य:
- आदिकाव्य एवं सनातन बीज: वाल्मीकि रामायण को आदिकाव्य माना गया है; क्योंकि इससे पूर्व पृथ्वी पर किसी काव्य की रचना नहीं हुई थी। इसी कारण इसे “काव्यबीजं सनातनम्” कहा गया है।
ग्रंथ की विशेषता–
- संरचना: इस महाकाव्य में 24हजार श्लोक तथा 500 सर्ग निहित हैं।
- पंचम वेद: इसे पंचम वेद की संज्ञा दी गई है। इसके पठन, श्रवण तथा स्वाध्याय से मानव में दिव्य गुणों का प्रादुर्भाव होता है।
आयोजन संबंधी सूचना:
श्री पेड़ा हनुमान मंदिर में यह कथा गंगा 10 अगस्त तक प्रतिदिन अपराह्न 3 बजे से सायं 5 बजे तक प्रवाहित होगी। मंदिर प्रबंधन समिति के व्यवस्थापक पं. श्री राम तिवारी, पं. योगेश तिवारी, निलेश तिवारी, अधिवक्ता अशोक सोनी, महेश सोनी तथा रामकिशन भूतड़ा ने समस्त श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर इस कथामृत का पान करने का आत्मीय आग्रह किया है।
परामर्श एवं चौपाई-
चौपाई
“सुनि प्रभु चरित होइ अति रावा। आस्रम निकट बिभीषनु आवा॥”
(अर्थात्: भगवान के दिव्य चरित्र और कथा को सुनने मात्र से जीव का परम कल्याण निश्चित हो जाता है।)
परामर्श संदेश-
जीवन की व्यस्तताओं के मध्य श्रीमद् वाल्मीकि रामायण जैसे धर्मग्रंथों का श्रवण एवं स्वाध्याय मन को शांति, विचार को शुद्धता तथा आचरण में देवत्व प्रदान करता है। समस्त नगरवासियों से विनम्र परामर्श है कि इस अल्पकालिक कथा-सत्र का लाभ उठाकर अपने जीवन को कृतार्थ करें।