
‘महाभारत का शांतिपर्व’ विषयक त्रिदिवसीय व्याख्यानमाला का शुभारंभ
परभणी, २७ अगस्त (विशेष प्रतिनिधि):
मानव जीवन को सफल बनाने हेतु आवश्यक समस्त नीतियां और विवेक सिखाने वाला अद्वितीय ग्रंथ महाभारत है। यह प्रतिपादन श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट (अयोध्या) के कोषाध्यक्ष पूज्य स्वामी गोविंददेव गिरि जी महाराज ने परभणी में ‘शांतिपर्व संदेश’ व्याख्यानमाला के प्रथम सत्र में व्यक्त किया। स्थानीय उद्यमी गोविंदप्रसाद अजमेरा परिवार द्वारा ‘अक्षदा मंगल कार्यालय’ में आयोजित त्रिदिवसीय ‘महाभारत का शांतिपर्व’ प्रवचनमाला में वे संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम का शुभारंभ स्वामी जी के पूजन तथा विधायक डॉ. राहुल पाटिल, पूर्व विधायक सुरेशदादा देशमुख, जिला परिषद उपाध्यक्ष श्रीकांत विटेकर, अधिवक्ता अशोक सोनी, आयोजक गोविंद अजमेरा तथा गोपाल अजमेरा द्वारा दीप प्रज्वलन से हुआ।
स्वामी जी ने कहा कि जीवन में सफलता अर्जित करने के लिए समयोचित और सटीक निर्णय लेने की क्षमता सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। विश्व में जिन्होंने भी यश प्राप्त किया, उन्होंने उपयुक्त समय पर विचारपूर्वक निर्णय लिए; निर्णय में त्रुटि अथवा समय चूकने पर असफलता का सामना करना पड़ता है। केवल परिश्रम ही पर्याप्त नहीं, अपितु विवेक, निर्णयक्षमता और परिस्थिति की पहचान आवश्यक है। महाभारत के नियमित अध्ययन और चिंतन से बुद्धि तीक्ष्ण होती है तथा विकट परिस्थितियों का सामना करने का सामर्थ्य विकसित होता है।
उन्होंने आगे कहा कि चारों वेदों का सार महाभारत में और महाभारत का सार श्रीमद्भगवद्गीता में समाहित है। भगवद्गीता महाभारत का अविभाज्य अंग होने के कारण महाभारत के अध्ययन के बिना गीता का मर्म समझना कठिन है। भगवान श्रीकृष्ण का आचरण ही भगवद्गीता पर सर्वश्रेष्ठ भाष्य है। गीता का अंतिम श्लोक विजय का संदेश देता है कि जहाँ श्रीकृष्ण जैसा विवेक और अर्जुन जैसी कर्तव्यनिष्ठा हो, वहाँ विजय निश्चित है। स्वामी जी ने आह्वान किया कि यदि संपूर्ण महाभारत का अध्ययन संभव न हो, तो प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम ‘शांतिपर्व’ और ‘अनुशासनपर्व’ का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए। शांतिपर्व भारतीय संस्कृति का ज्ञानकोश है, जिसमें समाज, राजधर्म, नीति और मानवीय कर्तव्यों का अनुपम ज्ञान समाहित है।
राजधर्म पर प्रकाश डालते हुए पूज्य स्वामी जी ने कहा कि महाभारत में पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को उपदेश देते हुए कहा था कि शासक का आचरण गर्भवती स्त्री के सदृश होना चाहिए। जिस प्रकार एक गर्भवती स्त्री सदैव अपने गर्भस्थ शिशु के कल्याण और सुरक्षा को प्राथमिकता देती है, उसी प्रकार एक सच्चे शासक के चिंतन में निरंतर अपनी प्रजा के समग्र कल्याण का भाव होना चाहिए।
इस अवसर पर भागवताचार्य बालू असोलेकर, उद्यमी जयप्रकाश बिहानी, डॉ. केदार खटिंग, डॉ. राजगोपाल कालानी, डॉ. विनोद मंत्री, उद्यमी ओमप्रकाश डागा, ह.भ.प. माधव बुवा आजेगांवकर, अतुल गुरु जोशी, घनश्याम मालपाणी, बालाजी जोशी सहित नगर के अनेक गणमान्य नागरिक और विशाल संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।