राज्यशिक्षा

सक्षम और सुसंस्कृत भारत के निर्माण के लिए शिक्षक आगे आएं – शिक्षा संचालक डॉ. महेश पालकर

परभणी: “शिक्षक समाज का निर्माण करने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटक है। राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों का योगदान बहुमूल्य है। कल का सक्षम और जागरूक नागरिक गढ़ने का उत्तरदायित्व शिक्षकों पर है। समाज में शिक्षकों का स्थान अत्यंत आदरणीय है और विद्यार्थियों के मन में अपने शिक्षकों के प्रति माता-पिता से भी अधिक विश्वास होता है। शिक्षा के चार आधारभूत स्तंभ हैं—विद्यालय-संस्था, शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावक। इन चारों घटकों में परस्पर समन्वय अनिवार्य है, क्योंकि इसी समन्वय से विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास संभव है। आज का विद्यार्थी ही कल का देश का समझदार नागरिक बनेगा। एक उत्तरदायी युवा पीढ़ी तैयार करने तथा सक्षम व सुसंस्कृत भारत के निर्माण के लिए शिक्षक स्वयं आगे आकर नेतृत्व करें।” यह प्रतिपादन महाराष्ट्र राज्य के शिक्षा संचालक डॉ. महेश पालकर ने किया।

​वह यहां ५ जुलाई को परभणी शहर की बाल विद्यामंदिर शिक्षा संस्था द्वारा संस्था की पूर्व उपाध्यक्ष स्वर्गीय प्रा. वासंतीताई नावंदर की जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित ‘आत्मचिंतन दिवस’ कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। इस गरिमामयी कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था के अध्यक्ष डॉ. नंदकुमार झरकर ने की, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में प्राचार्य डॉ. दीनानाथ फुलवाडकर उपस्थित थे। इस अवसर पर संस्था के सचिव डॉ. विवेक नावंदर, उपाध्यक्ष एडवोकेट विलासराव पोहंडूलकर, सह-सचिव एडवोकेट संजय देशपांडे, शिक्षाधिकारी डॉ. सविता बिरगे, उप-शिक्षाधिकारी गोविंद मोरे सहित अनेक गणमान्य जन, शिक्षाविद, मुख्याध्यापक और संस्था के सदस्य उपस्थित थे।

​आगे संबोधित करते हुए डॉ. पालकर ने कहा, “विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के दृष्टिकोण से शिक्षकों को सदैव चिंतनशील रहना चाहिए। अद्यतन ज्ञान प्राप्त करने के लिए शिक्षकों के लिए आत्मचिंतन आवश्यक है। अपनी कमियों को सुधारने और भविष्य के उत्कृष्ट नियोजन के लिए शिक्षकों को सिंहावलोकन (अतीत का निष्पक्ष मूल्यांकन) करना चाहिए। आपकी शाला में ‘आत्मचिंतन दिवस’ मनाया जाना वास्तव में शिक्षकों के इसी सिंहावलोकन का परिचायक है।”

​मुख्य वक्ता प्राचार्य दीनानाथ फुलवाडकर ने अपने व्याख्यान में कहा, “आत्मचिंतन ही व्यक्तित्व विकास की कुंजी है। यदि प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन अपने कर्मों, विचारों और लक्ष्यों का आत्मचिंतन करे, तो सफलता का मार्ग सुगम हो जाता है। संसार को जीतने से पूर्व स्वयं पर अटूट विश्वास होना आवश्यक है, और इस विश्वास के लिए अंतर्मन का आत्मविश्वास अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिसका स्वयं पर, सृष्टि पर और ईश्वर पर विश्वास होता है, वही आत्म-विजयी बनता है। विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए सामूहिक एकजुटता आवश्यक है। शिक्षक और संस्था के बीच का उत्कृष्ट समन्वय ही संस्था और विद्यार्थियों के विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। इसके लिए ध्येय, कर्तव्य और आत्मीयता—इन तीन बिंदुओं को सदैव सम्मुख रखना चाहिए। इससे सौहार्द उत्पन्न होता है और इसी सौहार्द के बल पर संस्था एक गौरवशाली इतिहास रचती है, जैसा कि बाल विद्यामंदिर शिक्षा संस्था ने कर दिखाया है। शिक्षक और संस्था चालक का एक साथ बैठकर आत्मचिंतन करना वैश्विक स्तर पर एक अनूठी और सराहनीय पहल है। शिक्षक का व्यवसाय केवल भाग्यशालियों को ही प्राप्त होता है। शिक्षक साक्षात ईश्वर का रूप हैं, इसलिए हमें अपना कार्य पूर्ण निष्ठा व प्रामाणिकता से करना चाहिए। इस कार्य में भौतिक सुख की अपेक्षा आत्मिक आनंद कहीं अधिक मूल्यवान है। किसी भी कार्य को यदि अंतःकरण से किया जाए, तो वह निश्चित ही सफल होता है। जब हम अपने कार्य को सफलतापूर्वक संपन्न करेंगे, तभी एक आत्मनिर्भर भारत का उदय होगा।”

​अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ. नंदकुमार झरकर ने कहा, “इस संस्था के संस्थाचालकों और शिक्षकों के समर्पण, त्याग और भक्ति के परिणामस्वरूप ही यह गौरवशाली इतिहास निर्मित हुआ है। हम सभी को इस स्वर्णिम अक्षरों में लिखे इतिहास को आगे बढ़ाने का निरंतर प्रयास करना चाहिए। इस गौरव को अक्षुण्ण रखने के लिए शिक्षक आत्मचिंतन करें और उज्ज्वल सफलता की इस परंपरा को निरंतर बनाए रखें।”

​कार्यक्रम की प्रस्तावना में संस्था के सचिव डॉ. विवेक नावंदर ने ‘आत्मचिंतन दिवस’ के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए संस्था की गौरवशाली परंपरा का विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि विगत दस वर्षों से आत्मचिंतन दिवस के माध्यम से शिक्षकों में एक नई चेतना और आत्मविश्वास का संचार करने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है। आधुनिक युग में शिक्षकों के सम्मुख अनेक चुनौतियां हैं, और उन चुनौतियों का सामना करने तथा विद्यार्थियों के कल्याण को सुरक्षित रखने के लिए आत्मचिंतन एक अत्यंत महत्वपूर्ण माध्यम है।

​इस अवसर पर अतिथियों का परिचय परामर्शदाता प्रवीण सोनोने और चंद्रकांत सिरसकर ने कराया। कार्यक्रम का कुशल मंच संचालन सुभाष ढगे ने किया, जबकि उप-मुख्याध्यापक रामदास तुम्मेवार ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का समापन जयश्री महामुने द्वारा प्रस्तुत ‘पसायदान’ के गरिमामयी गायन के साथ हुआ। कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए संस्था के समस्त शिक्षक एवं शिक्षेत्तर कर्मचारियों ने अथक परिश्रम किया।

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