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सुकी क्षेत्र में मिली इतिहास की अमूल्य धरोहर!

पूर्णा तहसील में मिली एक हज़ार वर्ष प्राचीन 'महिषासुरमर्दिनी' की मूर्ति; पुरातत्त्व विभाग से संरक्षण की मांग

पूर्णा:

परभणी जिले की पूर्णा तहसील के अंतर्गत सुकी क्षेत्र में लगभग एक हज़ार वर्ष प्राचीन मानी जाने वाली महिषासुरमर्दिनी (दुर्गा) देवी की प्राचीन मूर्ति मिलने से इतिहास प्रेमियों, पुरातत्त्वविदों और श्रद्धालुओं में भारी उत्सुकता जागृत हो गई है। इस दुर्लभ खोज से पूर्णा क्षेत्र की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत पर नवीन प्रकाश पड़ा है।

​सुकी ग्राम के पूर्व में स्थित नाले के समीप बळीराम भीमराव रेनगडे के कृषि क्षेत्र (खेत) में तृणनाशक (खरपतवार नाशक) का छिड़काव चल रहा था। नाले से जल लाते समय उनकी दृष्टि जल-प्रवाह के कारण अनावृत हुई (बाहर आई) एक प्राचीन मूर्तिशिल्प पर पड़ी। ग्रामीणों के सहयोग से जब उन्होंने मूर्ति को सुरक्षित बाहर निकाला, तो यह समाचार संपूर्ण क्षेत्र में तीव्र गति से फैल गया और दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी।

​इस घटना की सूचना सह-शिक्षक विकास बनसोडे ने गंगाखेड के इतिहास संशोधक प्रा. डॉ. अविनाश खोकले को दी। उन्होंने मूर्ति का गहन अध्ययन करके इसके उत्तर चालुक्य कालखंड, अर्थात ईसवी सन की ग्यारहवीं से तेरहवीं शताब्दी की होने का प्राथमिक निष्कर्ष प्रस्तुत किया है।

​डॉ. खोकले के अनुसार, उच्च किरीट मुकुट, अष्टभुजा स्वरूप, सिंहारूढ़ मुद्रा, महिषासुर वध का दृश्य, त्रिभंग शारीरिक संरचना और समृद्ध आभूषणों से यह स्पष्ट होता है कि यह मूर्ति शाक्त परंपरा की महिषासुरमर्दिनी की है। कृष्ण पाषाण (काले पत्थर) से निर्मित यह मूर्ति दीर्घकाल तक भूमि और जल के भीतर रहने के कारण धूसर-हरित (स्लेटी-हरी) आभा की हो गई है, किंतु इसकी कलात्मकता आज भी अक्षुण्ण है।

​इतिहासकारों ने मांग की है कि इस अत्यंत महत्वपूर्ण पुरातात्विक विरासत का तत्काल संरक्षण किया जाए और मूर्ति को पुरातत्त्व विभाग के संरक्षण में लेकर वैज्ञानिक पद्धति से सुरक्षित रखा जाए। इस खोज को पूर्णा तहसील के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है, और भविष्य में इस क्षेत्र में और अधिक पुरातात्विक अवशेष प्राप्त होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

बॉक्स समाचार:

​”सुकी क्षेत्र की यह खोज केवल धार्मिक श्रद्धा का विषय नहीं है, अपितु यह मराठवाड़ा के प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास को पुनर्जीवित करने वाला एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य सिद्ध हो सकती है।”

प्रा. डॉ. अविनाश खोकले, इतिहास संशोधक

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