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चारठाणा में मिला यादव नरेश महादेवराय का 13 वीं शताब्दी का दुर्लभ शिलालेख;

चारठाणा /परभणी:

जिले के जिंतूर तहसील अंतर्गत चारठाणा ग्राम में मध्ययुगीन यादव राजवंश के प्रतापी चक्रवर्ती सम्राट राजा महादेवराय के शासनकाल का तेरहवीं शताब्दी का एक अत्यंत दुर्लभ दानपत्र शिलालेख प्राप्त हुआ है। ग्राम के मध्य स्थित देशपांडे गली परिसर में दीपमाल के पूर्व दिशा में स्थित प्राचीन मंदिर के भग्नावशेषों के मध्य एक शिलाखंड पर यह लेख उत्कीर्ण पाया गया है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि से मध्यकालीन चारठाणा और तत्कालीन महाराष्ट्र के सामाजिक, धार्मिक व आर्थिक इतिहास को एक नवीन दिशा प्राप्त होगी।

वातावरणीय प्रभावों से खंडित अवस्था में मिला अभिलेख

यह अभिलेख तीन भागों में पाषाण पर उत्कीर्ण है। शताब्दियों तक खुले वातावरण में रहने के कारण अक्षरों पर मौसमी प्रभाव पड़ा है, जिससे अनेक अक्षर क्षीण और अस्पष्ट हो चुके हैं। दूसरे भाग का कुछ अंश पूर्णतः खंडित है। इतिहासकारों और शोधकर्ताओं ने इसका विधिवत छाप लेकर अथक परिश्रम के पश्चात इसका समग्र वाचन किया। वर्तमान में यह पाषाण दो भागों में विभक्त हो चुका है तथा इसके निचले भाग पर मध्ययुगीन परंपरा के अनुसार शाप की आकृति उत्कीर्ण है।

शिलालेख का विवरण और अभिप्राय

प्राप्त शिलालेख संस्कृत भाषा और देवनागरी लिपि में उत्कीर्ण है। इसमें शालिवाहन शक 1182, रौद्री नाम संवत्सर, आषाढ़ कृष्ण एकादशी 5 जुलाई 1260, सोमवार की तिथि उल्लिखित है। लेख के अनुसार, चक्रवर्ती सम्राट यादव राजा महादेवराय के विजय-राज्य के कालखंड में श्रीनारायण भगवान के ‘रंगभोग’ (दैनिक पूजन-अर्चन) हेतु भूमि दान दी गई थी

​देवता को नित्य ‘लाखोली’ (प्रचुर मात्रा में पुष्प-अर्पण) की अविरल सेवा सुनिश्चित करने हेतु इस व्यय के निमित्त आय उत्पन्न करने वाली भूमि का प्रबंध किया गया था। इस धार्मिक कार्य की स्थायी व्यवस्था स्थानीय ‘श्रेष्ठी’ (सधन वैश्य/व्यापारी वर्ग) द्वारा की गई थी।

​दान की गई भूमि के संरक्षण हेतु लेख के अंत में धर्मशास्त्रीय शाप-श्लोक अंकित है:

“स्वदत्तां परदत्तां वा यो हरेत वसुंधराम्। षष्टिर्वर्षसहस्राणि विष्ठायां जायते कृमिः॥”

अर्थात, स्वयं दी गई अथवा दूसरों द्वारा दी गई दानभूमि का जो कोई भी हरण करता है, वह साठ सहस्र वर्षों तक विष्ठा में कृमि बनकर वास करता है। साथ ही, “यस्य यस्य यदा भूमिः तस्य तस्य तदा फलम्” श्लोक द्वारा स्पष्ट किया गया है कि जिस समय यह भूमि जिसके अधिकार में रहेगी, उस समय उसे उसी के अनुरूप पुण्यफल प्राप्त होगा।

शिलालेख विवरण संक्षेप

  • स्थान: देशपांडे गली, मानस्तंभ के निकट, ग्राम चारठाणा, तहसील जिंतूर (परभणी)
  • भौगोलिक निर्देशांक (GPS): एन-19.626969, ई-76.538944
  • कालखंड: 13वीं शताब्दी 5 जुलाई 1260 ईस्वी)
  • तिथि / संवत: शालिवाहन शक 1182, रौद्री संवत्सर, आषाढ़ वद्य 11
  • तत्कालीन शासक: यादव सम्राट राजा महादेवराय
  • भाषा एवं लिपि: संस्कृत भाषा, देवनागरी लिपि
  • प्रयोजन: श्रीनारायण मंदिर में पुष्प-अर्पण (लाखोली) सेवा हेतु भूमि दान
  • शोधकर्ता: श्री लक्ष्मीकांत सोनवटकर (मूर्तिशास्त्र अभ्यासक)
  • अभिलेख वाचक: श्री अनिल किसन दुधाणे एवं श्री अथर्व पिंगळे
  • विशेष सहयोग: श्री नागेश जोशी, श्री राहुल सरोदे
  • संदर्भ: IElV-73

मध्ययुगीन धार्मिक अर्थव्यवस्था का अमूल्य साक्ष्य

इस शोध से सिद्ध होता है कि यादवकाल में मंदिरों के दैनंदिन संचालन, देव-आराधना और पुष्पार्चन जैसी नियमित धार्मिक विधियों के लिए स्वतंत्र आर्थिक संपदा की व्यवस्था की जाती थी। राजाओं के साथ-साथ तत्कालीन समाज का श्रेष्ठी (व्यापारी) वर्ग भी इन धार्मिक आयोजनों में आर्थिक रूप से सक्रिय भागीदारी निभाता था। यह अभिलेख केवल एक धार्मिक दानपत्र न होकर तत्कालीन मंदिर-प्रबंधन, व्यापारिक वर्ग की संपन्नता और मध्ययुगीन भू-व्यवस्था का एक सशक्त प्राथमिक ऐतिहासिक प्रमाण है।

​”चारठाणा में मंदिर स्थापत्य के प्रमाण के रूप में नृसिंह मंदिर का एक स्तंभलेख पूर्व से उपलब्ध था, किंतु उसमें काल का उल्लेख नहीं था। इस नवीन शिलालेख की प्राप्ति से चारठाणा के वैभवशाली इतिहास की कालक्रमबद्ध पुष्टि हुई है, जो संपूर्ण परभणी जनपद के इतिहास-लेखन में मील का पत्थर सिद्ध होगा।”

लक्ष्मीकांत सोनवटकर, मूर्तिशास्त्र अभ्यासक

 

​”यह शिलालेख यादवकालीन महाराष्ट्र के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक जीवन का अत्यंत प्रामाणिक दस्तावेज है। इससे तत्कालीन काल-गणना, भूमि-अधिकार और धार्मिक अर्थव्यवस्था के अंतर्संबंधों को समझने में सहायता मिलती है।”

अनिल दुधाणे, शिलालेख अभ्यासक, पुणे

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