राज्यशिक्षा

राम और भरत न होते, तो आज भ्रातृ-प्रेम का अस्तित्व ही समाप्त हो गया होता:

पं.निर्मल कुमार शुक्ल

पेड़ा हनुमान मंदिर में आयोजित ‘श्रीमद् वाल्मीकि रामायण कथा महोत्सव’ का भावपूर्ण प्रसंग; 10 अगस्त को होगा ज्ञान यज्ञ का विश्राम

परभणी (विशेष संवाददाता):

यदि श्री राम और भरत न होते, तो संसार से भाई-भाई के पवित्र संबंध का भाव ही समाप्त हो गया होता। श्री राम और भरत भ्रातृ-प्रेम के सर्वोच्च आदर्श हैं। यदि भगवान श्री राम ने पिता द्वारा प्रदत्त अयोध्या के युवराज पद को तिनके के समान त्याग दिया, तो भरत ने भी अपनी माता द्वारा मांगे गए और पिता द्वारा स्वीकृत राज्य को उसी सहजता से ठुकरा दिया। अयोध्या का राजसिंहासन एक कंदुक (गेंद) की भांति बन गया था, जिसे एक ओर श्री राम ने अस्वीकार किया तो दूसरी ओर भरत ने भी उसे स्वीकार नहीं किया। पूरे 14 वर्षों तक राजसत्ता दोनों भाइयों के निःस्वार्थ प्रेम के मध्य लुढ़कती रही, किंतु दोनों में से किसी ने भी सत्ता का मोह नहीं किया।”

​उक्त उद्गार प्रख्यात कथावाचक पं. निर्मल कुमार शुक्ल ने पेड़ा हनुमान मंदिर परिसर में आयोजित ‘श्रीमद् वाल्मीकि रामायण कथा महोत्सव’ के दौरान व्यक्त किए।

गीता और रामायण का मौलिक अंतर

​कथा प्रसंग को विस्तार देते हुए व्यासपीठ से पं. शुक्ल ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता और रामायण में मूल अंतर यही है कि गीता (महाभारत) में भ्रातृ-वर्ग सत्ता और अधिकार के लिए संघर्षरत हैं, जबकि रामायण में अधिकार के परित्याग की होड़ है। महाभारत का बीजारोपण श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम श्लोक में ही दृष्टिगोचर होता है— ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥’ छोटे भाई पांडु के निधन के पश्चात धृतराष्ट्र को अपने 105 पुत्रों के प्रति समभाव रखना चाहिए था, किंतु उन्होंने ‘मामकाः’ (मेरे पुत्र) और ‘पाण्डवाः’ (पांडु के पुत्र) कहकर भेद उत्पन्न कर दिया। यही भेदभाव महाभारत युद्ध का मुख्य कारण बना।

​इसके विपरीत, रामायण में राजा दशरथ के लिए राम और भरत उनके दो नेत्रों के समान थे— ‘मोरे भरत राम दुइ आंखी’। माता कौशल्या भी दोनों पुत्रों में कोई भेद नहीं मानती थीं और भरत को श्री राम से भी अधिक स्नेह देती थीं। श्री राम भरत को अपने प्राणों के समान प्रिय मानते थे, तो भरत के लिए श्री राम ही उनका सर्वस्व थे।

शकुनि सफल, किंतु मंथरा निष्फल

​पं. शुक्ल ने कहा कि रामायण और महाभारत दोनों ही कथाओं में षड्यंत्रकारी पात्र उपस्थित थे—महाभारत में शकुनि और रामायण में मंथरा। दोनों ने ही भाइयों के मध्य वैमनस्य और फूट डालने का कुत्सित प्रयास किया। शकुनि अपने षड्यंत्र में सफल रहा, किंतु मंथरा पूर्णतः असफल सिद्ध हुई। इसका मुख्य कारण यह था कि श्री राम और भरत के मध्य विश्वास और समर्पण की नीव अत्यंत सुदृढ़ थी, जबकि कौरवों-पांडवों के मध्य विश्वास का धरातल अत्यंत दुर्बल था।

भरत के चार प्रस्ताव और श्री राम का धर्म-पालन

​चित्रकूट प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि भरत जी पिता द्वारा प्रदत्त राज्य का त्याग कर श्री राम को मनाने चित्रकूट पहुंचे। वहां उन्होंने श्री राम के समक्ष चार प्रस्ताव रखे—

  1. ​श्री राम, लक्ष्मण और सीता अयोध्या लौट चलें तथा उनके स्थान पर दोनों भाई (भरत-शत्रुघ्न) वन में रहें।
  2. ​लक्ष्मण और शत्रुघ्न अयोध्या लौट जाएं तथा भरत, श्री राम के साथ वन में रहें।
  3. ​श्री राम अयोध्या लौटकर सिंहासन संभालें और तीनों भाई उनकी सेवा करें।
  4. ​चित्रकूट में ही ‘रामराज्य’ की स्थापना हो और वे सब सेवक बनकर शासन-कार्य चलाएं।

​किंतु भगवान श्री राम ने पितृ-आज्ञा और धर्म-पालन को सर्वोपरि रखते हुए इन प्रस्तावों को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया और भरत से पिता के आदेश का पालन करने में सहायता मांगी। अंततः, श्री राम ने अपनी चरण-पादुकाएं भरत को सौंपीं। विश्व की राजनीति के इतिहास में यह स्वर्णिम अवसर था, जब प्रभु की चरण-पादुकाओं को सिंहासन पर आरूढ़ कर उनका राज्याभिषेक किया गया।

10 अगस्त को कथा विश्राम; श्रद्धालुओं से उपस्थिति की अपील

​इस भव्य कथा ज्ञान यज्ञ का विश्राम 10 अगस्त को आयोजित होगा। मंदिर प्रबंधन समिति के व्यवस्थापक पं. श्रीराम तिवारी, योगेश तिवारी, नीलेश तिवारी, अधिवक्ता रमेश शर्मा, नंदलाल सोनी, हनुमान दास कालानी, नंद किशोर कालानी, महेश सोनी, ओम प्रकाश उपाध्याय, राम किसन भूतड़ा, ठाकुर शिवेंद्र प्रताप सिंह एवं भगवान भोजवानी ने समस्त धर्मप्रेमी जनता से अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर कथामृत पान करने एवं पुण्य लाभ अर्जित करने का विनम्र आग्रह किया है।

॥ लोकोपदेश (कथा का संदेश) ॥

1. स्वार्थ और सत्ता से श्रेष्ठ है भ्रातृ-प्रेम: आधुनिक युग में जहां तनिक सी संपत्ति और अधिकारों के लिए पारिवारिक संबंधों में दरार आ जाती है, वहां राम-भरत का चरित्र हमें सिखाता है कि संबंधों की मर्यादा और स्नेह, भौतिक संपदा व सत्ता से कहीं अधिक मूल्यवान हैं।

2. गृह-कलह का मूल कारण ‘भेदभाव’: जब परिवार या समाज में ‘मेरा’ और ‘तेरा’ (मामकाः व पाण्डवाः) का भाव पनपता है, तब महाभारत जैसा विनाश निश्चित होता है। समभाव ही शांति और समृद्धि का मार्ग है।

3. दृढ़ विश्वास ही षड्यंत्रों का ढाल है: यदि पारिवारिक संबंधों की नींव सत्य, समर्पण और अटूट विश्वास पर टिकी हो, तो मंथरा या शकुनि जैसे षड्यंत्रकारी तत्व कभी भी संबंधों को छिन्न-भिन्न नहीं कर सकते।

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