पवित्र श्रावण मास के उपलक्ष्य में विशेष शिव स्तुति: महादेव के चरणों में अर्पित ‘प्रथम पुष्प’
पवित्र श्रावण मास के उपलक्ष्य में विशेष शिव स्तुति: महादेव के चरणों में अर्पित ‘प्रथम पुष्प’
धर्म एवं संस्कृति —
पवित्र श्रावण मास के पावन अवसर पर देवाधिदेव महादेव की आराधना हेतु विशेष शिव स्तुति श्रृंखला का शुभारंभ किया जा रहा है। व्यस्तता के कारण गत सोमवार को यह प्रस्तुति पाठकों तक नहीं पहुँच सकी थी, जिसे आज ‘प्रथम पुष्प’ के रूप में भगवान शिव के चरणों में श्रद्धापूर्वक समर्पित किया जा रहा है।
मूल स्तुति एवं उसका शुद्ध हिंदी भावार्थ
मूल श्लोक:
वन्दे शैल सुता पतिम् सुरपतिम् वन्दे त्रिलोकी पतिम्।
वन्दे दिव्य जटाधरम् त्रिनयनम् वन्दे मुरारिप्रियम्।।
वन्दे काल कराल नाशक विभो वन्दे तु मृत्युंजयम्।।
वन्दे भूत पतिम् सुरार्चित पदम् वन्दे शिवम् शंकरम्।
वामांके चंद्रानना गिरिसुता शीर्षस्थ भागीरथी।।
हस्ते शूल कपाल दिव्य डमरू कंठे सदा वासुकी।।
चित्ताकर्षक अमृतांशु भाले पापक्षयी चंद्रिका।।
कार्तिक नन्दि गणेश गौरि सहितं वंदे उमा वल्लभम्।।
भावार्थ
- देवाधिदेव की वंदना: हम पर्वतराज हिमालय की पुत्री माता पार्वती के पति, देवों के देव तथा तीनों लोकों के स्वामी भगवान शिव की वंदना करते हैं। जिनके मस्तक पर दिव्य जटाएं सुशोभित हैं, जो त्रिनेत्रधारी हैं और जो भगवान श्रीहरि विष्णु (मुरारि) के अत्यंत प्रिय हैं, ऐसे प्रभु को हमारा नमन है।
- काल और मृत्यु पर विजय: जो भीषण काल का नाश करने वाले सर्वव्यापी प्रभु हैं, जो मृत्यु पर विजय प्राप्त कराने वाले ‘मृत्युंजय’ हैं, समस्त भूतगणों के स्वामी हैं तथा जिनके चरणों की पूजा समस्त देवता करते हैं, उन कल्याणकारी भगवान शंकर की हम वंदना करते हैं।
- दिव्य स्वरूप एवं आभूषण: जिनके वाम अंग (बाईं ओर) में चंद्रमा के समान सुंदर मुख वाली गिरिजा (माता पार्वती) विराजमान हैं और जिनके शीश पर पापनाशिनी गंगा (भागीरथी) स्थित हैं; जिनके हाथों में त्रिशूल, कपाल और दिव्य डमरू है तथा जिनके कंठ में सदैव नागराज वासुकी शोभायमान रहते हैं।
- परिवार सहित महादेव का नमन: जिनके ललाट पर चित्ताकर्षक, अमृतमयी और समस्त पापों का नाश करने वाली चंद्रकला सुशोभित है; ऐसे कार्तिकेय, नंदी, प्रथम पूज्य श्री गणेश और माता गौरी के साथ विराजमान माता उमा के प्रिय पति भगवान शिव की हम श्रद्धापूर्वक वंदना करते हैं।

