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अखंड सौभाग्य की कामना

देश भर में श्रद्धा व उल्लास के साथ मनाई गई वट पूर्णिमा

परभणी विशेष समाचार –

सुहागिनों ने वट वृक्ष की परिक्रमा कर बांघा रक्षासूत्र, पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए रखा निर्जला व्रत

 ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के पावन अवसर पर आज देश भर में वट पूर्णिमा का त्योहार पारंपरिक श्रद्धा, हर्षोल्लास और अटूट विश्वास के साथ मनाया गया। सुबह से ही शहरों और गांवों के प्रमुख मंदिरों व चौराहों पर स्थित वट वृक्षों (बरगद) के पास सुहागिन महिलाओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। लाल, पीले और हरे रंग के पारंपरिक परिधानों में सजी महिलाओं ने पूरी विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और अपने अखंड सौभाग्य व पति की दीर्घायु की कामना की। महामारी के बाद इस साल त्योहार को लेकर महिलाओं में एक अलग ही उत्साह और रौनक देखने को मिली।

भोर होते ही उमड़ी भीड़, वैदिक मंत्रोच्चार से गूंजे परिसर

गुरुवार सुबह सूर्योदय के साथ ही वट वृक्षों के नीचे पूजा-अर्चना का दौर शुरू हो गया। महिलाओं ने सबसे पहले बरगद के पेड़ की जड़ों में जल अर्पित किया। इसके बाद सूत (कच्चा धागा) लेकर वृक्ष की 7, 108 या यथाशक्ति परिक्रमा करते हुए उसे तने पर लपेटा। पंडितों द्वारा कराए जा रहे वैदिक मंत्रोच्चार और महिलाओं के मंगल गीतों से पूरा माहौल भक्तिमय हो गया। पूजा के बाद महिलाओं ने एक-दूसरे को सुहाग की सामग्री (सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां) भेंट कर आशीर्वाद लिया। कई जगहों पर सामूहिक पूजा के विशेष इंतजाम किए गए थे।

सावित्री-सत्यवान की कथा का श्रवण और दान का महत्व

वट पूर्णिमा के व्रत में कथा श्रवण का विशेष महत्व है। पूजा के दौरान महिलाओं ने झुंड बनाकर सती सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा सुनी, जिसमें बताया गया कि कैसे सावित्री ने अपने तपोबल और चातुर्य से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस मांग लिए थे। व्रत रखने वाली महिलाओं ने बताया कि यह त्योहार केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि दांपत्य जीवन में निष्ठा और समर्पण का प्रतीक है। इस अवसर पर भीगे हुए चने, मौसमी फल (आम, कटहल) और वस्त्रों का दान किया गया।


 

 

 

पर्यावरण संरक्षण का संदेश: रोपे गए नए बरगद के पौधे

इस वर्ष वट पूर्णिमा के त्योहार में धार्मिक आस्था के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण की अनूठी झलक भी देखने को मिली। कई सामाजिक संस्थाओं और जागरूक महिलाओं ने केवल पूजा ही नहीं की, बल्कि विभिन्न स्थानों पर बरगद के नए पौधे भी रोपे। महिलाओं का कहना था कि बरगद का पेड़ सबसे ज्यादा ऑक्सीजन देता है और सदियों तक जीवित रहता है। इसे बचाना और नए पौधे लगाना हमारी धरती को जीवन देने जैसा है। कई सोसायटियों में गमलों में वट वृक्ष की टहनी लगाकर प्रतीकात्मक पूजा की गई ताकि पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे।

बाजारों में रही भारी रौनक, सुहाग सामग्री की जमकर खरीदारी

त्योहार के मद्देनजर पिछले दो दिनों से बाजारों में जबरदस्त रौनक देखी जा रही थी। कपड़ा बाजार, सराफा और सौंदर्य प्रसाधनों (मेकअप) की दुकानों पर महिलाओं की भारी भीड़ रही। विशेषकर पूजा में इस्तेमाल होने वाले बांस के पंखे, सूत का धागा, फल और फूलों की बिक्री में भारी उछाल आया। दुकानदारों के मुताबिक, इस साल व्यापार में पिछले साल की तुलना में करीब 30 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। शाम के समय भी महिलाओं ने सपरिवार मंदिरों के दर्शन किए, जिससे मिठाई और रेस्टोरेंट व्यवसायियों के चेहरे भी खिले नजर आए।

संपादकीय नोट: वट पूर्णिमा का यह पर्व भारतीय संस्कृति में महिलाओं के त्याग, तपस्या और परिवार के प्रति अगाध प्रेम को दर्शाता है। यह त्योहार आधुनिक दौर में भी हमारी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत बनाए रखने का काम कर रहा है।

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