दीन-दुखियों की सेवा का मिला अनुपम प्रतिफल: भिक्षुक के वेश में आए उद्योगपति ने कन्या के विवाह में भेंट किया भव्य भवन
परभणी/नासिक विशेष संवाददाता:
मानवता और परोपकार की भावना कभी निष्फल नहीं जाती, इसका एक अत्यंत प्रेरणादायी और हृदयस्पर्शी उदाहरण नासिक नगर में देखने को मिला। नगर के एक होटल में श्रम करने वाली पूजा नामक निर्धन कन्या को उसकी वर्षों की निस्वार्थ सेवा का ऐसा अप्रत्याशित फल प्राप्त हुआ, जिसे देखकर विवाह समारोह में उपस्थित जनसमूह स्तब्ध रह गया।
विगत पाँच वर्षों से उस होटल के सम्मुख एक वृद्ध दीन-हीन अवस्था में भिक्षाटन हेतु बैठते थे। समाज का एक बड़ा वर्ग उन्हें तिरस्कृत दृष्टि से देखता था, किंतु वहाँ कार्यरत पूजा प्रतिदिन रात्रि में शेष बचा हुआ भोजन अत्यंत आदर एवं स्नेहपूर्वक उस वृद्ध को अर्पित करती थी। वह सदैव कहती थी, “बाबा! भोजन गर्म है, शांतिपूर्वक ग्रहण कीजिए।” स्वयं घोर निर्धनता में जीवनयापन करते हुए, दिन में श्रम और रात्रि में अध्ययन कर अपनी माता के सुखद भविष्य का स्वप्न देखने वाली पूजा ने होटल मालिक के कड़े विरोध के उपरांत भी अपनी यह सेवा-साधना निरंतर जारी रखी।
कालांतर में वह वृद्ध अचानक अदृश्य हो गए। इसी बीच पूजा का विवाह निश्चित हुआ। विवाह के शुभ अवसर पर जब मंगल मंडप में उत्सव का वातावरण था, तभी अचानक एक भव्य वाहन वहाँ आकर रुका। वाहन से सुरुचिपूर्ण परिधान में सुसज्जित वही वृद्ध सज्जन अवतरित हुए और सीधे मंच पर पहुँचे।
उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए उन्होंने एक विस्मयकारी रहस्योद्घाटन किया। उन्होंने बताया कि वे कोई वास्तविक भिक्षुक नहीं, अपितु प्रख्यात उद्योगपति विजयसिंह राठौड़ हैं। अपनी धर्मपत्नी के देहावसान के उपरांत संसार में मानवता और संवेदना की परीक्षा लेने के उद्देश्य से उन्होंने भिक्षुक का वेश धारण किया था। उद्योगपति राठौड़ ने भावुक होकर कहा, “संसार ने मुझे हेय दृष्टि से देखा, किंतु इस कन्या ने मुझे सदैव एक मनुष्य का यथोचित सम्मान दिया। इसकी आर्थिक स्थिति भले ही निर्धन थी, किंतु इसका हृदय अत्यंत विशाल है।” इसके उपरांत उन्होंने कृतज्ञता स्वरूप पूजा को एक भव्य नवनिर्मित आवास के स्वामित्व के दस्तावेज उपहार स्वरूप प्रदान किए।
पूजा ने उस आवास में निर्धनों एवं असहायों हेतु एक निःशुल्क अन्नक्षेत्र (भंडारा) प्रारंभ किया, जिसके मुख्य द्वार पर यह संदेश अंकित है: “अन्न का अनादर न करें, व्यर्थ न फेंकें; यह किसी क्षुधातुर का संबल बन सकता है।”
लोकोपदेश:
भौतिक संपदा और धन-वैभव क्षणभंगुर हैं; संसार का समस्त वैभव यहीं छूट जाना है। अतः मानव को अत्यधिक अर्थ-लोलुपता त्यागकर परोपकार, कृतज्ञता और सत्यनिष्ठा का मार्ग अपनाना चाहिए। सत्कर्म और निस्वार्थ सेवा ही मानव की वास्तविक पहचान हैं, जिनका सत्परिणाम अवश्य फलीभूत होता है।

