यशवाड़ी मंदिर दुर्घटना: सभी घायलों का आर.पी. हॉस्पिटल में निःशुल्क उपचार
गंभीर रूप से घायल युवक को मिला जीवनदान- मानवी स्वास्थ्य के प्रति अस्पताल का एक कदम आगे
परभणी, १७ जुलाई:
यशवाड़ी में मंदिर ढहने के कारण लगभग २५ से ३० श्रद्धालु मलबे के नीचे दब गए थे। इस भीषण दुर्घटना में ५ श्रद्धालुओं की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई। विधायक डॉ. राहुल पाटिल के निर्देशानुसार घायल रोगियों का पूर्णतः निःशुल्क उपचार किया गया। इतना ही नहीं, इनमें से ३ गंभीर रूप से घायल रोगियों की अत्यंत खर्चीली अस्थि शल्यचिकित्सा (हड्डी का ऑपरेशन) भी निःशुल्क की गई।
इस दुर्घटना के घायलों में से एक युवा रोगी की स्थिति अत्यंत चिंताजनक थी। किंतु, आर.पी. हॉस्पिटल के चिकित्सकों (डॉक्टरों) के अनवरत परिश्रम और सटीक उपचार के कारण इस युवक को मृत्यु के मुख से सुरक्षित बाहर निकालने में सफलता प्राप्त हुई है।
तत्काल सहायता के निर्देश
इस घटना की सूचना मिलते ही आर.पी. हॉस्पिटल के प्रमुख विधायक डॉ. राहुल पाटिल ने तत्काल बचाव कार्य एवं चिकित्सीय सहायता प्रारंभ करने के आदेश दिए। उनके निर्देशानुसार आर.पी. हॉस्पिटल के अधिष्ठाता (डीन) डॉ. प्रमोद शिंदे के मार्गदर्शन में चिकित्सकों के दल ने सहायता एवं उपचार कार्य में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
चुनौतीपूर्ण उपचार और शल्यचिकित्सा
दुर्घटना के पश्चात जब एक घायल युवक को चिकित्सालय लाया गया, तब उसकी स्थिति अत्यंत नाजुक थी। उसके पैर की अस्थि (हड्डी) भग्न होने के कारण सर्वप्रथम उस पर उपचार कर तत्काल सफल शल्यचिकित्सा की गई। किंतु, इसके पश्चात उसके शरीर में अन्य कई गंभीर चिकित्सीय जटिलताएं उत्पन्न हो गईं।
वक्षस्थल पर तीव्र आघात लगने के कारण उसके फेफड़े को गंभीर क्षति पहुंची थी। फेफडो में वायु भर जाने के कारण (न्यूमोथोरैक्स) उस पर तीव्र सूजन आ गई थी और उसे श्वास लेने में अत्यंत कठिनाई हो रही थी। शरीर में ऑक्सीजन का स्तर अत्यधिक गिर गया था और रक्तचाप (बी.पी.) निरंतर परिवर्तित होने के कारण स्थिति चिंताजनक बनी हुई थी।
फेफडो में संचित वायु और द्रव को बाहर निकालने के लिए वक्षस्थल में तत्काल एक विशेष नलिका (आई.सी.डी. – इंटरकोस्टल ड्रेनेज) डाली गई। इससे फेफडो पर पड़ा दबाव कम हुआ और रोगी की श्वसन प्रक्रिया सुचारू होने में सहायता मिली। शरीर में संक्रमण न फैले, इसके लिए अत्यंत कठोर एवं सटीक औषधि उपचार प्रारंभ किया गया। रोगी के फेफडे स्वतः पूर्ण रूप से कार्य करने तक उसे पूरे १५ दिनों तक वेंटिलेटर (प्राणवायु यंत्र) पर रखा गया था।
चिकित्सकों के दल का अथक प्रयास
चिकित्सालय के अधिष्ठाता डॉ. प्रमोद शिंदे के मार्गदर्शन में उपचार के दौरान डॉ. अमीर तदवी, डॉ. महेश देशमुख, डॉ. शहाजी बोडखे, डॉ. सलाम ताम्बोली, डॉ. संतोष हरकल, डॉ. दैठनकर, डॉ. पूजा सरकटे सहित चिकित्सालय के परिचर्या वर्ग (नर्सिंग स्टाफ) एवं अन्य चिकित्सीय कर्मियों ने अहोरात्र (दिन-रात) इस युवक की विशेष देखभाल की।

