परभणी, 18 अक्टूबर: परभणी जिले की समृद्ध शिल्प संपदा ही जिले का वास्तविक गौरव है, और इस प्राचीन धरोहर का संरक्षण करना आज समय की मांग है। यह विचार मूर्तिकला के विशेषज्ञ और वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. अरविंद सोनटक्के ने व्यक्त किए।
परभणी जिलाशिकारी और परभणी जिला ऐतिहासिक विरासत अध्ययन समूह के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय ‘वारसादूत’ (विरासत दूत) कार्यशाला में 16 अक्टूबर को वे बतौर मुख्य वक्ता संबोधित कर रहे थे।
कार्यशाला के दौरान डॉ. सोनटक्के ने मूर्तिकला की बारीकियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मंदिरों में स्थापित मूर्तियों को केवल धार्मिक दृष्टिकोण से न देखकर, मंदिर की बाहरी दीवारों पर उकेरी गई ‘सुरसुंदरी’ की शिल्पकला का भी गहन अध्ययन किया जाना चाहिए। उन्होंने विस्तार से बताया कि कैसे तत्कालीन कलाकारों ने इन शिल्पों में मानवीय भावनाओं और जीवन के विभिन्न पहलुओं को असाधारण रचनात्मकता के साथ जीवंत किया है।
स्थानीय स्थापत्य का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि गुप्तेश्वर मंदिर ईंटों के शिखर वाला एकमात्र विशिष्ट मंदिर है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसे प्राचीन स्मारकों और उनकी शिल्प संपदा के ऐतिहासिक महत्व को पहचानते हुए उन्हें संरक्षित किया जाना बेहद आवश्यक है।
इसके साथ ही, ‘पुत्रवल्लभा’ शिल्प के माध्यम से स्त्री-मन की विभिन्न भावनाओं को कलाकारों द्वारा किस संवेदनशीलता और निपुणता से प्रस्तुत किया गया है, इसका उन्होंने सरल शब्दों में विश्लेषण किया। इस व्याख्यान के माध्यम से उपस्थित प्रतिभागियों को परभणी जिले की प्राचीन मूर्तिकला और मंदिरों के स्थापत्य वैभव को करीब से समझने का अवसर मिला।
🟣 मूर्तिकला के विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. अरविंद सोनटक्के सर का स्वागत करते हुए पुरातत्व विभाग के सह-निदेशक श्री अमोल गोटे सर।
