परभणी:
“विद्यार्थी जीवन में सफलता के शिखर छूने के लिए निरंतर अध्ययन, अटूट लगन और कड़े परिश्रम को अपना मूलमंत्र बनाएं। शिक्षा को ही अपनी वास्तविक पूंजी मानकर जीवन को समृद्ध करें। ज्ञान के साथ-साथ संस्कारों का संबल भी अनिवार्य है, क्योंकि संस्कार ही मनुष्य को समाज में उसकी असली पहचान दिलाते हैं।” यह प्रेरणादायी विचार अमेरिका में कार्यरत प्रख्यात न्यूक्लियर मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. सुषमा भार्गव ने व्यक्त किए। वह बाल विद्यामंदिर हाईस्कूल, नानल पेठ में आयोजित एक विशेष संवाद सत्र के दौरान छात्र-छात्राओं को संबोधित कर रही थीं।
डॉ. भार्गव ने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए आगे कहा, “जीवन में समाज और गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता तथा माता-पिता के प्रति समर्पण का भाव हमेशा बनाए रखें। आप दुनिया के किसी भी कोने में जाएं, अपनी प्रतिभा का परचम लहराएं, लेकिन अपनी मातृभूमि की जड़ों को कभी न भूलें।” अपने स्कूली दिनों को याद करते हुए उन्होंने भावुक स्वर में कहा कि बाल विद्यामंदिर से मिले अनुशासन, संस्कार और ज्ञान की बदौलत ही वह आज इस मुकाम तक पहुंच पाई हैं, जिसके लिए वह विद्यालय की सदैव ऋणी रहेंगी।
इस अवसर पर उनके साथ इंजीनियर अजय भार्गव, उनके सहपाठी एवं विद्यालय के पूर्व छात्र डॉ. श्रीकृष्ण कातनेश्वरकर, प्रो. संजीवनी जोशी-गोडसे, विलास जहागीरदार, प्रल्हाद जोशी, महेश जोशी, उमाकांत पाटिल, विद्यालय के प्रधानाचार्य अरुण बोराडे, पर्यवेक्षिका सीमा बोके, बलीराम कोपरटकर और काउंसलर प्रवीण सोनोने सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।
कार्यक्रम के दौरान संस्था की ओर से प्रधानाचार्य अरुण बोराडे ने डॉ. सुषमा भार्गव को स्मृति चिह्न, मानपत्र, कंबल और पुष्पगुच्छ भेंट कर भावभीना सम्मान किया। इस दौरान डॉ. श्रीकृष्ण कातनेश्वरकर और प्रो. संजीवनी जोशी-गोडसे ने भी अपने विचार साझा करते हुए छात्र जीवन की सुनहरी स्मृतियां ताज़ा कीं। कार्यक्रम का कुशल मंच संचालन और आभार प्रदर्शन सुभाष ढगे ने किया।