
परभणी / छत्रपति संभाजीनगर:
परभणी जिले की पालम तहसील स्थित मौजे फळा के विख्यात ‘श्री संत मोतीराम महाराज संस्थान’ (पंजीकरण सं. A-4859 परभणी) सार्वजनिक ट्रस्ट में हुए कथित करोड़ों रुपये के वित्तीय घपले, अवैध ऋण एवं संपत्तियों के गैर-कानूनी हस्तांतरण मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की छत्रपति संभाजीनगर खंडपीठ ने कड़ा रुख अपनाया है।
अदालत ने धर्मादाय सह-आयुक्त (नांदेड संभाग) के समक्ष लंबित धारा 41 के आवेदन तथा आरोपित न्यासियों (ट्रस्टियों) के तत्काल निलंबन की मांग पर समयबद्ध व त्वरित सुनवाई पूरी कर अंतिम फैसला सुनाने के सख्त निर्देश जारी किए हैं।
यह आदेश संस्थान के न्यासी रामचंद्र मारोतराव पौळ, यादव रंगनाथराव पौळ और प्रकाश रामराव पौळ द्वारा अधिवक्ता युवराज आर. बारहाते के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दाखिल रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया।
अदालत के आदेश के प्रमुख बिंदु
धर्मादाय सह-आयुक्त (नांदेड) की अदालत में जुलाई 2024 से लंबित प्रकीर्ण आवेदन सं. 61/2014 (वर्तमान में समामेलित आवेदन सं. 02/2026) में लगातार पड़ रही गैर-जरूरी तारीखों पर हाईकोर्ट ने गंभीर संज्ञान लिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक न्यास की संपत्तियों का संरक्षण सर्वोपरि है; अतः इस प्रकरण पर बिना किसी देरी के समयबद्ध सुनवाई पूरी की जाए। साथ ही, अंतरिम रोक (स्टे) व आरोपित न्यासियों के तत्काल निलंबन वाले आवेदन पर प्राथमिकता के आधार पर गुण-दोष के तहत फौरन निर्णय पारित किया जाए।
मामले की पृष्ठभूमि एवं गंभीर आरोप
- बिना अनुमति 4.5 करोड़ का कर्ज और पंढरपुर की संपत्ति का हस्तांतरण: संस्थान की वर्तमान प्रबंध समिति पर आरोप है कि उन्होंने धर्मादाय आयुक्त की पूर्व अनुमति के बिना (धारा 36 का खुला उल्लंघन) बुलढाणा अर्बन को-ऑपरेटिव क्रेडिट सोसायटी से करीब 3.5 करोड़ रुपये का ऋण लिया। इसके आधार पर पंढरपुर स्थित नवनिर्मित बहुमूल्य भक्तनिवास को 15 वर्षों के अवैध प्रबंधन समझौते के तहत बैंक को सौंप दिया गया। इसके तहत आय का 40 प्रतिशत हिस्सा बैंक को दिया जा रहा है और रसीदों पर भी ट्रस्ट के स्थान पर बैंक के नाम का इस्तेमाल किया जा रहा है।
- सरकारी जांच रिपोर्ट में अनियमितताएं सिद्ध: सहायक धर्मादाय आयुक्त (परभणी) द्वारा 20 फरवरी 2026 को सौंपी गई आधिकारिक जांच रिपोर्ट में संस्थान के अध्यक्ष सहित संबंधित न्यासियों को कर्तव्य में लापरवाही, कदाचार, सरकारी आदेशों के उल्लंघन और अवैध संपत्ति हस्तांतरण का दोषी पाया गया है। रिपोर्ट में इनके विरुद्ध धारा 41 और धारा 66 के तहत कठोर दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश की गई है।
- कृषि भूमि की उपेक्षा से आर्थिक नुकसान: मौजे जवळा (तहसील पालम) स्थित गट सं. 74/2 की 3 हेक्टेयर 20 आर उपजाऊ कृषि भूमि को जानबूझकर बंजर छोड़ दिया गया, जिससे संस्थान को भारी राजस्व का नुकसान उठाना पड़ा।
- दो वर्षों से तारीख पर तारीख का खेल: संस्थान के नुकसान को रोकने के लिए श्रद्धालुओं और मूल न्यासियों ने 24 अप्रैल 2026 को अंतरिम रोक व निलंबन की अर्जी दी थी, लेकिन उस पर ठोस सुनवाई करने के बजाय उसे दूसरे मामले में समामेलित (मर्ज) कर प्रक्रिया को अटकाए रखा गया।
हाईकोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद अब अवैध ऋण, 15 वर्षीय प्रबंधन अनुबंध और दोषी न्यासियों के निलंबन पर शीघ्र फैसला आने की राह साफ हो गई है। न्यायालय के इस रुख से वारकरी संप्रदाय और श्रद्धालुओं के बीच संतोष का माहौल है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी अधिवक्ता युवराज आर. बारहाते ने की।